Shri Ganga Prasad

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Sunday, 11 April 2010

स्मृति सन्देश

वह स्नेह सुधा-जीवन शैली ,
वह भावुकता, सहनशीलता, कर्मठता, मार्मिकता
क्या व्यक्त करूँ? अभिव्यक्ति नहीं ।
क्या लिपिबद्ध करूँ? लेखनी समर्थ नहीं ।
वह विद्यादीप थी, अब ज्ञान का प्रकाश है-
जिसकी रश्मि में अदभ्य साहस की प्रखरता है
स्नेह संतृप्त धैर्य व कर्म निष्ठता का सन्देश है ।
मेरे बच्चों-
कर्मनिष्ठ बनो, विद्यादीप पुंज बन जगमगाते रहो
युग युगांतर तक देदीप्यमान रहो,
सत्कर्म करो, निर्लिप्त रहो,
संतृप्त रहो, हर्षित रहो ।
ये मेरा आशीष है । ये मेरा आशीष है ॥
हे मातु ! करूँ किस भांति नमन
मेरा हर क्षण, हर पल तेरे आशीष में निमग्न
तेरे आशीष में निमग्न ।
तुमको नमन । तुमको नमन ।


-चुन्नू

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